ज़ुबैदा सुलताना
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पहचान: लोकप्रिय उपन्यासकारज़ुबैदा सुल्ताना का जन्म लाहौर के एक विद्वतापूर्ण और साहित्यिक परिवार में हुआ। उनके दादा डॉ. मुहम्मद हुसैन ख़ान लाहौर के प्रसिद्ध एडवर्ड कॉलेज के संस्थापकों में से एक थे और वहाँ मानव शरीर रचना (Human Anatomy) के अध्यापक थे। उनके पिता ख़ान अहमद हुसैन साहिब-ए-दीवान शायर, उपन्यासकार, कहानीकार तथा प्रसिद्ध मासिक पत्रिका "शबाब-ए-उर्दू" के संपादक थे। इसी साहित्यिक वातावरण ने ज़ुबैदा सुल्ताना की साहित्यिक रुचि को विकसित किया।उनका साहित्यिक जीवन बहुत कम आयु में ही आरम्भ हो गया था। उनकी पहली बाल-कहानी "पादाश" मासिक "शबाब-ए-उर्दू" में प्रकाशित हुई। इसके बाद उनके लेख और कहानियाँ नियमित रूप से उसी पत्रिका में प्रकाशित होने लगे और 1931 में, छात्र जीवन के दौरान ही, वे "शबाब-ए-उर्दू" के संपादकीय मंडल से जुड़ गईं। बाद में उनके दो प्रारंभिक कहानी-संग्रह "निजात-ए-रंगीं" और "शबिस्तान-ए-अलम" प्रकाशित हुए। 1960 से उन्होंने नियमित रूप से उपन्यास-लेखन आरम्भ किया और एक के बाद एक अनेक उपन्यास लिखे।उनके लोकप्रिय सामाजिक और प्रेमप्रधान उपन्यासों में "सफ़्व" (1969), "रुबाब" (1971), "तूबा" (1974), "छोटी बेगम", "रंग-ए-जुनूँ", "ताहिरा" और "रूहाना" विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन उपन्यासों ने उर्दू के लोकप्रिय कथा-साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया और महिलाओं की भावनाओं, मनोविज्ञान तथा सामाजिक समस्याओं के प्रभावशाली चित्रण के कारण व्यापक लोकप्रियता हासिल की।ज़ुबैदा सुल्ताना ने अंग्रेज़ी साहित्य, विशेषकर बच्चों और रहस्य-रोमांच (सस्पेंस) पर आधारित उपन्यासों का उर्दू में अनुवाद भी किया। उनके प्रसिद्ध अनुवादों में वॉल्टर स्कॉट के उपन्यास "दरिया किनारे वाला बंगला" तथा हार्डी बॉयज़ श्रृंखला का "ज़िंदा लाश" शामिल हैं।