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शौकत सब्ज़वारी

शौकत सब्ज़वारी

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इस लेखक की 14 प्रकाशित कृतियों का अन्वेषण करें — सच्चे पाठकों के लिए संकलित

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पहचान: प्रसिद्ध भाषाविद्, आलोचक और शोधकर्ताशौकत सब्ज़वारी का जन्म मालिक राम के अनुसार 1905 या 1906 को मेरठ में हुआ था। शौकत सब्ज़वारी का असली नाम सैयद शौकत अली और वालिद का नाम सैयद असद अली था। उनके पूर्वज मुग़ल काल में मशहद (ईरान) से भारत आए थे और ज़िला बुलंदशहर के मिर्ज़ापुर नामक स्थान पर बस गए थे। जब 1857 में इस इलाक़े की शांति और अमन-चैन तहस-नहस हो गया, तो उनका ख़ानदान मेरठ में आकर बस गया।उन्होंने मेरठ के मदरसा इमदादुल उलूम से फ़ारसी और अरबी की शिक्षा हासिल की, जिसके बाद 1924 में मौलवी फ़ाज़िल और 1927 में मुंशी फ़ाज़िल की परीक्षाएँ पास कीं। पिता के विरोध के बावजूद उन्होंने अंग्रेज़ी शिक्षा हासिल की और प्राइवेट छात्र के रूप में इंटर से लेकर एम.ए. तक की परीक्षाएँ पास कीं। उन्होंने फ़ारसी और अरबी दोनों विषयों में एम.ए. की डिग्रियां लीं, क़ानून (एल-एल.बी.) की डिग्री हासिल की और फिर आगरा यूनिवर्सिटी से उर्दू में भी एम.ए. किया। वह पहले इस्लामिया Inter कॉलेज बरेली और बाद में मेरठ कॉलेज के फ़ारसी विभाग में शिक्षक रहे।बंटवारे के बाद, वह अंदलीब शादानी के कहने पर ढाका चले गए, जहाँ वह ढाका यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग के अध्यक्ष (विभागाध्यक्ष) नियुक्त हुए। यहीं से उन्होंने 1952 में उर्दू भाषाविज्ञान (लिसानियात) में डॉक्टरेट (पी-एच.डी.) की डिग्री हासिल की, जिसकी तैयारी वे मेरठ में रहने के दौरान से ही कर रहे थे। उन्होंने अपने साहित्यिक सफ़र की शुरुआत कहानी लेखन से की थी और उनकी पहली कहानी मशहूर पत्रिका "अदबी दुनिया" में छपी थी। इसके बाद वे "निगार" and "मुआरिफ़" जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लिखते रहे।शौकत सब्ज़वारी की अकादमिक प्रसिद्धि 1946 में उनकी पहली पुस्तक "फ़लसफ़ा-ए-कलाम-ए-ग़ालिब" के प्रकाशन के साथ शुरू हुई। हालाँकि, एक भाषाविद् के रूप में उनकी वास्तविक पहचान तब बनी जब 1956 में ढाका से उनका शोध प्रबंध "उर्दू ज़बान का इर्तिका" (उर्दू भाषा का विकास) पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। भाषाविज्ञान के क्षेत्र में उनकी अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों में "दास्तान-ए-ज़बान-ए-उर्दू", "लिसानी मसाइल" और "उर्दू लिसानीयात्" शामिल हैं। उनकी रचनाओं ने उर्दू भाषा के इतिहास और भाषाई चर्चाओं को नए नज़रिए दिए।ग़ालिब के अध्ययन के संदर्भ में "ग़ालिब: फ़िक्र-ओ-फ़न" भी उनकी एक महत्वपूर्ण रचना है, जबकि आलोचनात्मक लेखों के संग्रह "मेयार-ए-अदब" और "नई पुरानी क़दरें" उर्दू साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। उर्दू भाषाविज्ञान में शानदार सेवाओं के लिए उन्हें "दाऊद अदबी इनाम" से भी सम्मानित किया गया था।निधन: शौकत सब्ज़वारी का इंतकाल 19 मार्च 1973 को कराची में हुआ।

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