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ख़्वाजा अहमद अब्बास

ख़्वाजा अहमद अब्बास

लेखक

इस लेखक की 19 प्रकाशित कृतियों का अन्वेषण करें — सच्चे पाठकों के लिए संकलित

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परिचय: अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भारतीय फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक, उपन्यासकार, प्रसिद्ध पत्रकार तथा उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी के प्रगतिशील लेखक।भारतीय उपमहाद्वीप की साहित्यिक, पत्रकारिता और फिल्मी दुनिया में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिन्होंने अपने बहुआयामी कार्यों के माध्यम से इतिहास में स्थायी और उज्ज्वल स्थान बनाया। ख़्वाजा अहमद अब्बास उन्हीं महान हस्तियों में से एक हैं, जिनकी शख्सियत साहित्य, पत्रकारिता और सिनेमा—तीनों क्षेत्रों में समान रूप से चमकती है। वे न केवल एक श्रेष्ठ कहानीकार और उपन्यासकार थे बल्कि एक उच्च कोटि के पत्रकार, फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और प्रगतिशील चिंतक भी थे। उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी तीनों भाषाओं पर उनकी समान पकड़ ने उनकी प्रतिभा को और व्यापक बनाया।ख़्वाजा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून 1914 को पानीपत में एक शिक्षित और साहित्यिक परिवार में हुआ। उनके परिवार की विद्वत परंपरा अत्यंत मजबूत थी। उनके परनाना मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली उर्दू साहित्य के महान कवि और आलोचक थे। उनके दादा ख़्वाजा ग़ुलाम अब्बास 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के पहले शहीदों में से थे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य और क़ानून की डिग्रियाँ प्राप्त कीं।उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘नेशनल कॉल’ से की और शीघ्र ही The Bombay Chronicle से जुड़ गए, जहाँ उन्होंने संवाददाता और फिल्म समीक्षक के रूप में कार्य किया। उनका प्रसिद्ध कॉलम “Last Page” भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक मील का पत्थर है, जो कई दशकों तक चलता रहा और बाद में Blitz में भी प्रकाशित होता रहा। इस कॉलम ने उन्हें अत्यधिक लोकप्रियता दिलाई। उन्होंने फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट और निकिता ख्रुश्चेव जैसी विश्व-प्रसिद्ध हस्तियों के इंटरव्यू भी किए।उन्होंने अपने जीवन में 74 पुस्तकें, 90 कहानियाँ और 3000 से अधिक पत्रकारिता लेख लिखे। उनका उपन्यास ‘इंक़लाब’ साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।फिल्मी दुनिया में वे एक सुधारक और यथार्थवादी के रूप में उभरे। उन्होंने 1946 में बंगाल के अकाल पर आधारित फिल्म ‘धरती के लाल’ बनाई, जिसे भारतीय सिनेमा की पहली सामाजिक यथार्थवादी फिल्मों में माना जाता है। उन्होंने ‘नीचा नगर’ जैसी फिल्म की पटकथा लिखी, जिसे कान्स फिल्म फेस्टिवल में ‘पाम डी’ओर’ पुरस्कार मिला। वे राज कपूर की प्रसिद्ध फिल्मों ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘मेरा नाम जोकर’ और ‘बॉबी’ के पटकथा लेखक भी थे। फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ के माध्यम से उन्होंने अमिताभ बच्चन को फिल्म जगत में पहली बार प्रस्तुत किया। उनकी फिल्मों ‘शहर और सपना’ और ‘दो बूंद पानी’ को राष्ट्रीय एकता पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उन्हें भारत सरकार द्वारा 1969 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया।वे एक सच्चे राष्ट्रवादी और प्रगतिशील विचारक थे, जिन्होंने फिल्म सेंसरशिप के खिलाफ भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में ऐतिहासिक कानूनी संघर्ष भी किया। उनकी आत्मकथा “I Am Not an Island” उनकी जीवन यात्रा और संघर्षों का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। जीवन के अंतिम समय में दिल के दौरे और पक्षाघात के बावजूद उन्होंने लेखन जारी रखा।निधन:1 जून 1987 को 72 वर्ष की आयु में मुंबई में उनका निधन हुआ और वहीं उन्हें दफनाया गया।

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